बेंगलुरु: आज की दुनिया में जलवायु संकट, प्लास्टिक प्रदूषण और संसाधनों की कमी जैसे मुद्दे हर चर्चा का हिस्सा बन चुके हैं। समाधान अक्सर जटिल और दूर के लगते हैं, लेकिन कुछ लोग ऐसे होते हैं जिनके लिए टिकाऊ जीवन कोई नई अवधारणा नहीं, बल्कि उनके बचपन की यादों का हिस्सा है। बेंगलुरु स्थित क्लाइमेट टेक स्टार्टअप माइनस्को (MYNUSCo) की कहानी यहीं से शुरू होती है – एक ऐसे समय और जगह से जहां समानता, साझेदारी और साझा संसाधन जीवन का स्वाभाविक हिस्सा थे। यह कंपनी सिर्फ बायोमटेरियल बनाने वाली नहीं है, बल्कि वह सोच का प्रतीक है जो मानती है कि कारोबार तभी सार्थक होता है जब वह पर्यावरण और समाज दोनों के लिए काम करे।
साल 2015 में स्थापित इस कंपनी के पीछे हैं महादेव चिक्कन्ना (Mahadev Chikkanna), जो फाउंडर और सीईओ हैं, और उनकी पत्नी श्रुति उज्जानी रमेश (Shruthi Ujjani Ramesh), जो को-फाउंडर और डायरेक्टर हैं। आज माइनस्को कृषि कचरे और बांस जैसे संसाधनों से बायो कंपोजिट मटेरियल बना रही है, जो प्लास्टिक और कार्बन-गहन सामग्रियों का विकल्प बन सकते हैं। लेकिन इस सफलता की जड़ें किसी हाई-टेक लैब या बोर्डरूम में नहीं, बल्कि फाउंडर्स के बचपन के अनुभवों में छिपी हैं। महादेव का बचपन कर्नाटक के छोटे शहर केजीएफ की एक कॉलोनी में बीता। वह कॉलोनी एक छोटा-सा समाज थी, जहां देश के अलग-अलग हिस्सों से आए लोग रहते थे। अलग-अलग धर्म, अलग-अलग आय स्तर, लेकिन सुविधाएं सबके लिए समान थीं – स्कूल, अस्पताल, पार्क और परिवहन। महादेव कहते हैं, “वह कॉलोनी मेरे लिए टिकाऊ जीवन का पहला उदाहरण थी। वहां न तुलना थी, न दबाव – बस साथ रहना और साझा करना था।” इसी तरह श्रुति का बचपन कर्नाटक के दांडेली जैसे शांत और हरे-भरे शहर में बीता, जहां सामूहिक जीवन की भावना मजबूत थी। इन अनुभवों ने दोनों में समानता, साझेदारी और लोगों को साथ लेकर चलने की भावना पैदा की, जो बाद में कंपनी की नींव बनी।
महादेव की इंजीनियरिंग के दिनों में एक और घटना ने उन्हें गहराई से प्रभावित किया। घर से दूर रहते हुए उन्होंने अपनी पॉकेट मनी का आधा हिस्सा एक अनाथालय को दान करना शुरू किया। वे कहते हैं, “उस समय मुझे समझ आया कि असली खुशी किसमें है। अच्छे नंबर, नई चीजें या तारीफ – ये सब किसी के काम आने के सामने कुछ नहीं थे।” यहीं से उनके मन में यह सवाल मजबूत हुआ कि जीवन में काम ऐसा होना चाहिए जो दूसरों के लिए भी मायने रखे। महादेव ने करीब 15 साल आईटी सेक्टर में बिताए। अमेरिका, यूरोप, ब्रिटेन और भारत में ग्लोबल क्लाइंट्स के साथ प्रोजेक्ट्स संभालते हुए उन्होंने सिस्टम बनाना, टीम स्केल करना और बिजनेस समझना सीखा। लेकिन धीरे-धीरे उन्हें लगने लगा कि तकनीक कई बार सिर्फ दक्षता बढ़ाती है, मूल समस्याएं जस की तस रह जाती हैं। 2014 में जब वे बेंगलुरु लौटे, तो शहर पूरी तरह बदल चुका था। कभी गार्डन सिटी कहलाने वाला बेंगलुरु अब गर्मी, सूखती झीलों और अनिश्चित मौसम से जूझ रहा था। महादेव कहते हैं, “क्लाइमेट चेंज मेरे लिए तब थ्योरी नहीं रहा – वह मेरे आसपास हो रहा था।”
यहीं से माइनस्को की सोच का जन्म हुआ। एक ऐसा स्टार्टअप जो तकनीकी समझ को पर्यावरण और सामाजिक प्रभाव से जोड़े। शुरुआत में टीम ने कार्बन कम करने वाले हाई-परफॉर्मेंस कंपोजिट्स पर काम किया, लेकिन जल्द ही उन्हें एहसास हुआ कि असली बदलाव सामग्री के स्तर पर सोच बदलने से आएगा। उन्होंने बांस और कृषि कचरे जैसे तेजी से नवीनीकरण होने वाले संसाधनों की ओर रुख किया – ऐसे संसाधन जो भारत में प्रचुर हैं, लेकिन अक्सर जला दिए जाते हैं या बेकार चले जाते हैं। जलवायु चर्चा अक्सर ऊर्जा तक सीमित रह जाती है, लेकिन माइनस्को की टीम ने एक बड़े खाली स्थान को पहचाना: दुनिया के कुल कार्बन उत्सर्जन का बड़ा हिस्सा सामग्री के निर्माण, उपयोग और निपटान से आता है। महादेव बताते हैं, “ऊर्जा पर बात होती है, लेकिन सामग्री का कार्बन बोझ अक्सर छूट जाता है।” कंपनी ने कृषि और वन कचरे से इंजीनियर्ड बायो कंपोजिट्स विकसित किए, जिनमें धान की भूसी, पराली, कोयर और बांस शामिल हैं। इनसे बने मटेरियल प्लास्टिक और अन्य कार्बन-गहन विकल्पों की जगह ले सकते हैं।
माइनस्को ने दो प्रमुख श्रेणियां विकसित कीं: BioDur, जो ऑटोमोबाइल पार्ट्स, फर्नीचर और घरेलू उत्पादों में इस्तेमाल होती है, और BioPur, जो कम्पोस्ट होने वाले पैकेजिंग और डिस्पोजेबल उत्पादों के लिए है। महादेव कहते हैं, “हम सिर्फ मटेरियल नहीं बदल रहे – हम सिस्टम बदलने की कोशिश कर रहे हैं।” इन मटेरियल्स को इस तरह तैयार किया गया है कि मौजूदा फैक्ट्रियों में बिना बड़े बदलाव के इस्तेमाल हो सकें, जो इन्हें व्यावहारिक बनाता है। माइनस्को खुद को सिर्फ मटेरियल सप्लायर नहीं मानती – यह एक फुल स्टैक प्लेटफॉर्म है। किसान और फार्मर प्रोड्यूसर ऑर्गेनाइजेशन्स (एफपीओ) से कचरा लिया जाता है, उन्हें उचित कीमत दी जाती है। इससे पराली जलाने जैसी समस्याएं कम होती हैं और ग्रामीण आय बढ़ती है। इसके बाद मटेरियल प्रोसेस होता है। देश भर में फैले 25 से अधिक मैन्युफैक्चरिंग पार्टनर्स के जरिए उत्पाद बनते हैं। उपभोक्ताओं तक पहुंचने के लिए कंपनी ने eha.eco नाम का ब्रांड बनाया। eha सिर्फ बिक्री का जरिया नहीं है – यह एक प्रयोगशाला भी है। यहां से मिलने वाला फीडबैक इंडस्ट्रियल मटेरियल को बेहतर बनाने में मदद करता है। महादेव कहते हैं, “eha हमें असली दुनिया से जोड़ता है। यह हमें सिखाता है कि मटेरियल रोजमर्रा के इस्तेमाल में कैसे व्यवहार करता है।”
कंपनी की टीम में बड़ी संख्या में महिलाएं हैं, और कई सदस्य ग्रामीण पृष्ठभूमि से आते हैं। माइनस्को का मानना है कि टिकाऊ भविष्य तभी संभव है जब सामाजिक समानता भी साथ चले। विकास की बात करें तो माइनस्को ने शुरुआती पांच साल खुद के पैसों से रिसर्च की। 2019 में बिदादी में प्रोडक्शन यूनिट शुरू हुई। पहले निवेशक दोस्त और समर्थक बने, और 2022 में eha लॉन्च होने के बाद निवेशकों का भरोसा और बढ़ा। महादेव मानते हैं, “हमने कभी जल्दी में फैसले नहीं लिए। लंबी सोच हमारे लिए सबसे जरूरी रही।” आज कंपनी हर महीने करीब 40 टन कृषि कचरे को उपयोग में लाती है और 75 टन कार्बन उत्सर्जन को कम करती है। अगले दो साल में इस असर को पांच गुना करने की योजना है। भविष्य में माइनस्को खुद को एक पूर्ण सर्कुलर इकॉनमी प्लेटफॉर्म के रूप में देखती है – ऐसा प्लेटफॉर्म जो सामग्री की यात्रा को स्रोत से उपभोक्ता तक ट्रैक करे और उसका पर्यावरणीय असर साफ तौर पर दिखा सके। महादेव कहते हैं, “हम चाहते हैं कि टिकाऊ विकल्प खास न लगें – वे सामान्य हों।”
माइनस्को की विकास कथा यह दिखाती है कि जलवायु संकट का समाधान सिर्फ बड़े वादों या एक तकनीक से नहीं आएगा। इसके लिए सोच, सिस्टम और साझेदारी तीनों की जरूरत है। यह एक ऐसे स्टार्टअप की कहानी है जो मुनाफे से पहले असर को रखता है और साबित करता है कि कारोबार और जिम्मेदारी एक-दूसरे के विरोधी नहीं हैं। यह उस भविष्य की झलक है जहां कचरा संसाधन बनता है, टिकाऊ विकल्प आम हो जाते हैं, और तरक्की का मतलब सिर्फ बढ़त नहीं, बल्कि संतुलन होता है। माइनस्को जैसे उद्यम हमें सिखाते हैं कि छोटे अनुभवों से बड़े बदलाव आ सकते हैं, और सस्टेनेबिलिटी कोई दूर का सपना नहीं, बल्कि आज का निर्णय है।
