Sunday, September 13, 2026
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कैसे ‘Memoirs of India’ बना प्रतिष्ठित दुर्लभ किताबों का घर

दिल्ली के साउथ एक्सटेंशन में एक छोटी-सी गली है। बाहर ट्रैफ़िक का शोर, हॉर्न, धूल। लेकिन जैसे ही आप उस लकड़ी के पुराने दरवाज़े को धक्का देते हैं, सब कुछ ख़ामोश हो जाता है। हवा में हल्की-सी नमी वाली पुराने काग़ज़ की महक। कोई फैंसी लाइटिंग नहीं, कोई बैकग्राउंड म्यूज़िक नहीं। बस ऊँची-ऊँची अलमारियाँ और उनमें सिमटी हुई सैकड़ों सालों की साँसें। यहीं है मेमॉयर्स ऑफ़ इंडिया। तीन पीढ़ियों का प्यार, एक किताब की खुशबू में लिपटा हुआ।

सब कुछ शुरू हुआ 1967 में, कोलकाता में राजीव जैन के पिता उस दिन एक पारसी डॉक्टर के घर गए थे। डॉक्टर साहब विदेश जा रहे थे, घर ख़ाली कर रहे थे। अलमारी खोली तो उसमें से कुछ ऐसी किताबें निकलीं जिन्हें देखकर दिल धड़क गया। पुराने चमड़े की बाइंडिंग, हल्का पीला पड़ चुका काग़ज़, उन पर छपी स्याही जो आज भी गंध देती है। घर लौटे तो हाथ में पाँच-सात किताबें थीं और दिल में एक आग लग चुकी थी। उन्हें शायद पता भी नहीं था कि वो पल एक दिन पूरे परिवार की किस्मत लिख देगा।

1980 में दिल्ली आए तो सिर्फ़ दो सूटकेस और ढेर सारी किताबें थीं शुरुआत एक तंग-सी दुकान से हुई। कोई साइनबोर्ड तक नहीं था पहले। बस एक जिद थी – भारत की लिखी हुई स्मृतियाँ मिटने नहीं देंगे। धीरे-धीरे लोग आने लगे। कोई किताब ढूँढने, कोई बस उस महक को सूँघने। नाम पड़ा “मेमॉयर्स ऑफ़ इंडिया” और आज वही नाम सुनकर दुनिया भर के कलेक्टर सिर झुकाते हैं।

आज तीसरी पीढ़ी संभाल रही है – रिषभ जैन रिषभ को बचपन से याद है – छुट्टियों में दुकान पर बैठकर किताबों की धूल झाड़ना, पन्ने पलटना, पिता और दादाजी की बातें सुनना। वो हँसते हुए कहते हैं, “मेरे लिए ये बिज़नेस कभी नहीं रहा। ये घर का हिस्सा है। जैसे कोई अपने पुरखों की डायरी संभालता है, वैसे ही।”

डिजिटल ज़माने में भी वही पुराना वाला प्यार लोग कहते थे – अब कौन दुकान आएगा? सब ऑनलाइन हो गया। रिषभ ने कहा – ठीक है, ऑनलाइन जाएँगे, लेकिन दिल नहीं बदलेंगे। आज memoirsindia.com पर हर किताब की असली तस्वीरें होती हैं, हर दाग-धब्बे के साथ। ग्रेडिंग बिल्कुल ईमानदार। और अगर कोई किताब हाथ में लेकर पसंद न आए तो वापस भेज दो, कोई सवाल नहीं। फिर भी रिषभ मानते हैं – “दुकान का वो कोना, वो कुर्सी जहाँ दादाजी बैठते थे, वो आज भी हमारा तीर्थ है।”

उनकी सबसे प्यारी चीज़ें?

  • लेखक के हाथ से लिखा हुआ एक शब्द
  • पहली छपाई की वो कॉपी जिसमें अभी भी नई किताब जैसी स्मेल आती हो
  • 200-300 साल पुराने यात्रा वृत्तांत, जिनमें हाथ से बने नक्शे हों और हाँ, वो 1599 की किताब – Jan Huygen van Linschoten की “Voyages” – जिसे छूते ही लगता है समय रुक गया हो।

रिषभ कहते हैं, “हमारे यहाँ ग्राहक नहीं, परिवार बढ़ता है। कोई दादाजी आते थे, अब उनका पोता आता है। कभी-कभी पोता किताब लेने आता है और बताता है – यही किताब तो दादाजी मेरे बचपन में मुझे दिखाया करते थे। उस पल समझ आता है – हम सिर्फ़ किताबें नहीं बेच रहे, हम यादें आगे बढ़ा रहे हैं।”

अब सपना और बड़ा है दिल्ली के बाद बंगलौर, मुंबई, हैदराबाद… छोटे-छोटे पॉप-अप, बुक प्रदर्शनियाँ, लेक्चर जहाँ लोग किताबें सिर्फ़ न देखें, उनकी कहानियाँ भी सुनें। रिषभ की आँखों में चमक आती है जब वो कहते हैं, “हम चाहते हैं हर शहर में एक कोना हो जहाँ कोई बच्चा आकर पहली बार पुरानी किताब की खुशबू ले और समझे – हम कहाँ से आए हैं।”

क्योंकि अंत में यही सच है – मेमॉयर्स ऑफ़ इंडिया कोई दुकान नहीं। ये एक जीती-जागती विरासत है। एक परिवार की तीन पीढ़ियों की मेहनत, प्यार और जिद का नतीजा। और जब आप यहाँ से कोई किताब लेकर निकलते हैं, तो सिर्फ़ किताब नहीं ले जाते – एक टुकड़ा भारत का ले जाते हैं, जो सैकड़ों साल बाद भी ज़िंदा है।

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