Thursday, January 29, 2026
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सोमेश्वर घाटी का ये सरकारी स्कूल दे रहा है प्राइवेट स्कूलों को टक्कर

अल्मोड़ा (सोमेश्वर घाटी)। पहाड़ों की गोद में बसे छोटे से गाँव मनान का प्राथमिक विद्यालय आज पूरे इलाके में चर्चा का विषय बना हुआ है। पाँच साल पहले यहाँ महज 17 बच्चे पढ़ते थे, लेकिन आज यही स्कूल 70 से ज्यादा बच्चों से गुलजार है। दूर-दराज के गाँव खाकड़ी, पड़ोलिया, बाबरी और कड़ा से बच्चे पैदल चलकर यहाँ आते हैं। कई अभिभावक तो अपने बच्चों को दिल्ली और महँगे प्राइवेट स्कूलों में भेजने की सोच रहे थे, लेकिन अब गर्व से कहते हैं— “यहाँ की पढ़ाई दिल्ली से भी कहीं बेहतर है!”

इस चमत्कार की वजह हैं स्कूल की प्रधानाध्यापिका श्रीमती सोनू पांडे। जब वो यहाँ आईं तो स्कूल की हालत देखकर शायद किसी और का मन टूट जाता, लेकिन उन्होंने हार नहीं मानी। आज स्कूल में कदम रखते ही जो नजारा दिखता है, वो दिल जीत लेता है। बाहर बच्चों के जूते साफ-सुथरी कतार में लगे होते हैं, अंदर क्लासरूम रंग-बिरंगे टीचिंग मटेरियल से सजा हुआ है। दीवारों पर नक्शे, फसलें, राष्ट्रीय चिह्न—सब कुछ इतना आकर्षक कि बच्चे रटते नहीं, खेल-खेल में सीखते हैं। कोई घुमाते हुए व्हील से नंबर समझ रहा है, तो कोई अपनी हाथों से बनाई बाल-पत्रिका “फूलदेई” में अपनी कविता और ड्राइंग दिखा रहा है।

मैम बताती हैं, “हम अंग्रेजी माध्यम में पढ़ाते हैं, लेकिन हिंदी और अपनी संस्कृति को भी पूरा महत्व देते हैं। नर्सरी, एलकेजी, यूकेजी भी शुरू कर दी है। हर महीने अभिभावकों की क्लास लगती है—मैं पहले माँ-बाप को वॉवेल्स, नाउन, प्रोनाउन सिखाती हूँ, ताकि घर में बच्चे को सपोर्ट कर सकें।” यही वजह है कि आज अभिभावक स्कूल पर पूरा भरोसा करते हैं।

ग्रामवासी हितेश कांडपाल कहते हैं, “मेरा बड़ा बेटा दिल्ली में पढ़ता था, लेकिन छोटे को यहाँ डाला तो लगा—यहाँ की पढ़ाई कहीं ज्यादा अच्छी है। मैम ने अपने बच्चे भी यहीं पढ़ाए हैं, इससे बड़ा विश्वास और क्या होगा!” एक अन्य अभिभावक राजू नयाल मुस्कुराते हुए बोले, “प्राइवेट स्कूल से लाख गुना बेहतर है हमारा सरकारी स्कूल।” अंजू आर्य, जिनके दोनों बच्चे यहीं पढ़ते हैं, कहती हैं, “पढ़ाई हो, एक्टिविटी हो, बोलने का तरीका हो—सब कुछ परफेक्ट। अब कहीं और नहीं भेजेंगे।”

बाल दिवस पर तो स्कूल में जैसे उत्सव सा माहौल था। छोटी-छोटी काव्या, योगिता, ज्योति ने चाचा नेहरू पर इतने आत्मविश्वास से कविताएँ और भाषण दिए कि देखने वाले दंग रह गए। भोजन से पहले पूरा स्कूल एक साथ प्रार्थना करता है— “थैंक यू गॉड फॉर द फूड, थैंक यू गॉड फॉर एवरीथिंग” और फिर मिड-डे मील का स्वादिष्ट खाना खाता है। सफाई, योग, खेलकूद, ड्राइंग, कविता प्रतियोगिता—हर बच्चे बढ़-चढ़कर हिस्सा लेते हैं।

यह कहानी सिर्फ एक स्कूल की नहीं है। यह एक समर्पित शिक्षिका की मेहनत, जागरूक अभिभावकों के सहयोग और उन मासूम बच्चों की है, जो पहाड़ के दूरस्थ गाँव में भी बड़े सपने देखना और उन्हें पूरा करना सीख रहे हैं। मनान का यह छोटा सा सरकारी स्कूल साबित कर रहा है कि अगर शिक्षक दिल से लग जाएँ, अभिभावक साथ दें और थोड़ा सा प्यार व मेहनत डालें, तो सरकारी स्कूल न सिर्फ प्राइवेट स्कूलों के बराबर आ सकते हैं, बल्कि कई मामलों में उनसे आगे भी निकल जाते हैं।

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