Saturday, February 21, 2026
HomeBiz Creatorसुनील बिष्ट की अल्मोड़ा के पहाड़ों में मोती की खेती

सुनील बिष्ट की अल्मोड़ा के पहाड़ों में मोती की खेती

(मोहन भुलानी) अल्मोड़ा :  उत्तराखंड के पहाड़ी जिलों में पलायन की समस्या एक बड़ी चुनौती बनी हुई है। युवा पीढ़ी रोजगार की तलाश में शहरों की ओर रुख कर रही है, लेकिन कुछ ऐसे भी युवा हैं जो इस प्रवृत्ति को चुनौती दे रहे हैं। अल्मोड़ा जिले के हवालबाग ब्लॉक में स्थित बेह गांव के सुनील सिंह बिष्ट ऐसे ही एक युवा हैं, जिन्होंने शहर की चकाचौंध और लाखों की कमाई छोड़कर गांव लौटकर इंटीग्रेटेड फार्मिंग शुरू की। उनका सबसे अनोखा प्रयोग है मोती की खेती, जो पहाड़ी क्षेत्रों में एक क्रांतिकारी कदम साबित हो रहा है। सुनील की यह कहानी न केवल व्यक्तिगत संघर्ष और सफलता की मिसाल है, बल्कि उत्तराखंड के युवाओं के लिए पलायन रोकने और स्वरोजगार की नई राह दिखाती है।

उत्तराखंड के अल्मोड़ा जिले में हवालबाग विकासखंड के बेह गांव की हरी-भरी वादियों में सुनील सिंह बिष्ट का फार्म एक जीवंत उदाहरण है। यहां चारों ओर फैले पॉलीहाउस, तालाब और खेतों में न केवल सब्जियां और मछलियां पल रही हैं, बल्कि सीपों में मोती भी उगाए जा रहे हैं। अमर उजाला की रिपोर्ट के अनुसार, सुनील ने कोरोना महामारी के दौरान दिल्ली से अपना व्यवसाय छोड़कर गांव लौटने का फैसला किया और बंजर खेतों को उपजाऊ बनाकर इस अनोखी खेती की शुरुआत की। उनकी यह पहल अब क्षेत्र के अन्य युवाओं को प्रेरित कर रही है।

सुनील का प्रारंभिक जीवन

सुनील सिंह बिष्ट का जन्म 1986 में अल्मोड़ा जिले के बेह गांव में हुआ था। यह गांव हवालबाग ब्लॉक में स्थित है, जहां की प्राकृतिक सुंदरता और शांत वातावरण किसी को भी मोहित कर सकता है। लेकिन यहां की आर्थिक स्थिति और रोजगार के अवसरों की कमी के कारण अधिकांश युवा पलायन कर जाते हैं। सुनील ने अपनी प्रारंभिक शिक्षा गांव से ही पूरी की और 12वीं कक्षा तक यहीं पढ़ाई की। उसके बाद उच्च शिक्षा के लिए वे अल्मोड़ा और बागेश्वर चले गए। मीडिया में रुचि होने के कारण उन्होंने दिल्ली का रुख किया, जहां मास कम्युनिकेशन की डिग्री हासिल की।

दिल्ली पहुंचकर सुनील ने मीडिया जगत में कदम रखा। उन्होंने टीवी100, नेशनल ज्योग्राफिक, एनडीटीवी और आईबीएन7 जैसे प्रतिष्ठित चैनलों में काम किया। नेशनल ज्योग्राफिक के लिए उन्होंने यूके में छह महीने का प्रोजेक्ट भी संभाला, जहां उन्होंने अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अनुभव प्राप्त किया। मीडिया से कॉर्पोरेट जगत में कदम रखते हुए वे Paytm में प्रोक्योरमेंट मैनेजर बने। यहां उन्होंने टीम लीड की जिम्मेदारी संभाली और बड़े वेंडर्स के साथ डीलिंग की। बाद में एक अमेरिकी कंपनी आलिया प्री मीडिया में काम किया।

Sunil Bisht Brings Pearl Cultivation in almora

सुनील की महत्वाकांक्षा यहीं नहीं रुकी। उन्होंने अपना स्टार्टअप शुरू किया, जिसका पहले साल का टर्नओवर 1 करोड़ 27 लाख रुपये रहा। फोनपे जैसे बड़े क्लाइंट्स के साथ काम किया और चीन से सामान आयात करके बिजनेस को बढ़ाया। लेकिन जीवन में सब कुछ हमेशा सुचारू नहीं चलता। 2019-2020 में कोरोना महामारी ने सब कुछ बदल दिया। लॉकडाउन के कारण उनका माल फंस गया और 52 लाख रुपये का नुकसान हुआ। कंपनी बंद हो गई और सुनील गांव लौट आए। यहां उन्होंने देखा कि गांव बंजर पड़ा है, खेत खाली हैं और लोग पलायन कर रहे हैं। इसी ने उन्हें प्रेरित किया कि अब बाहर की कमाई को गांव में निवेश किया जाए।

सुनील ने बताया कि कोरोना काल में दिल्ली से व्यवसाय छोड़कर गांव लौटना एक कठिन फैसला था, लेकिन यह उनके जीवन का टर्निंग पॉइंट साबित हुआ। गांव की सादगी और प्रकृति ने उन्हें नई ऊर्जा दी। उन्होंने फैसला किया कि अब वे यहां रहकर कुछ ऐसा करेंगे जो न केवल उनकी कमाई का स्रोत बने, बल्कि गांव के विकास में भी योगदान दे।

बहुआयामी खेती की शुरुआत

गांव लौटकर सुनील ने इंटीग्रेटेड फार्मिंग की शुरुआत की, जो एक बहुआयामी खेती का मॉडल है। इसमें विभिन्न प्रकार की फसलें, पशुपालन और मत्स्य पालन को एक साथ जोड़ा जाता है। उन्होंने करीब 10,000 स्क्वायर मीटर में दो पॉलीहाउस बनाए, जहां शिमला मिर्च, मशरूम (ढिंगरी, बटन, कैलिफोर्निया) उगाए जाते हैं। एक बार शिमला मिर्च का उत्पादन इतना अधिक हुआ कि रोजाना 80 किलो तोड़ना पड़ता था। इसके अलावा, पूसा 5909 बासमती धान लगाकर उन्होंने अच्छा उत्पादन हासिल किया।

Sunil Bisht Brings Pearl Cultivation in almora

मत्स्य पालन में सुनील ने कॉमन कार्प, ग्रास कार्प, सिल्वर कार्प और पंगास जैसी मछलियां रखीं। पंगास के लिए उन्होंने पॉलीहाउस में विशेष तालाब बनाए, क्योंकि सर्दियों में तापमान 18 डिग्री से नीचे जाने पर मछलियां मर सकती हैं। गोटरी (बकरी पालन) में 40 बकरियां रखी गईं, जो दूध और मांस का स्रोत बनती हैं। मधुमक्खी पालन (हनी बी) में शुरू में 6 बॉक्स थे, अब 3 बचे हैं। उनके उत्पाद जैसे मशरूम और सब्जियां स्थानीय विकास भंडार में बेचे जाते हैं।

यह इंटीग्रेटेड मॉडल न केवल पर्यावरण अनुकूल है, बल्कि आर्थिक रूप से भी लाभदायक है। एक हिस्से का अपशिष्ट दूसरे हिस्से के लिए उर्वरक बन जाता है, जैसे मछली तालाब का पानी खेतों की सिंचाई में इस्तेमाल होता है। सुनील की यह पहल उत्तराखंड के पहाड़ी क्षेत्रों के लिए एक आदर्श मॉडल साबित हो रही है, जहां जलवायु और भूमि की सीमाएं पारंपरिक खेती को चुनौती देती हैं।

मोती की खेती

सुनील की सबसे बड़ी उपलब्धि है मोती की खेती (पर्ल कल्चर), जो उत्तराखंड के पहाड़ी इलाकों में बिल्कुल नया है। रुद्रपुर, चमोली और कुछ अन्य जगहों पर भी इसकी शुरुआत हुई है, लेकिन सुनील का प्रयोग अनोखा और प्रेरणादायक है। अमर उजाला की रिपोर्ट में बताया गया है कि सुनील ने 100 वर्गमीटर के तालाब से 450 सीपों के साथ इसकी शुरुआत की, जो सफल रही और अब उन्हें सालाना चार लाख रुपये की कमाई हो रही है। वे जिले में मोती की खेती करने वाले पहले किसान हैं।

मोती की खेती में मीठे पानी के सीप (ओएस्टर) का इस्तेमाल होता है। सुनील ने कई तालाब बनाए, जहां एक तालाब में 850 से अधिक सीप और कुल 600-650 अन्य में डाले गए हैं। प्रक्रिया इस प्रकार है:

  • सीप को ऑपरेशन के लिए उपयुक्त आकार (1-2.5 इंच) होने पर तैयार किया जाता है।
  • प्लायर से मुंह 10 mm खोलकर अंदर न्यूक्लियस (सोडियम नाइट्रेट से बने छोटे शेप, मूल्य ₹7) डाला जाता है। एक सीप में 2-4 न्यूक्लियस डाले जा सकते हैं।
  • सीप अपनी चमकदार परत (नैक्रे) से न्यूक्लियस को ढकती है, और 18-20 महीनों में मोती बनता है।
  • डिजाइनर मोती भी बनाए जा सकते हैं, जैसे हार्ट, ओवल, फेस शेप आदि।
  • एक सीप से औसतन 2 मोती मिलते हैं, कैजुअल्टी रेट 20-30% रहता है।
  • बल्क में मोती ₹120-150 में बिकते हैं। 3500 सीप से 7000 मोती बनने पर ₹3 लाख से अधिक कमाई संभव है।

सुनील ने बताया कि सीप काई और माइक्रोप्लैंकटन पर निर्भर हैं। तालाब में रनिंग वाटर रखा जाता है, और फिल्ट्रेशन के लिए बंजर खेत छोड़े गए हैं ताकि पानी साफ रहे और बीमारियां न फैलें। सांप, चील जैसी समस्याओं से बचाव के लिए छोटी मछलियों और सीपों के लिए कवर्ड टैंक बनाए गए हैं। ट्रेनिंग उन्होंने हिसार (हरियाणा), कोलकाता और हैदराबाद से ली।

परिवार, श्रम और स्वास्थ्य

सुनील का सफर आसान नहीं था। परिवार की चुनौतियां सबसे बड़ी रहीं। उनकी पत्नी और बच्चे हल्द्वानी में रहते हैं, क्योंकि गांव की सादगी उन्हें पसंद नहीं आई। लेकिन सुनील को गांव का सुकून मिला, और वे यहां अकेले ही संघर्ष कर रहे हैं। श्रम की समस्या भी बड़ी है। पहाड़ों में लेबर महंगा और अनियमित है। शुरू में नेपाली लेबर रखे, अब हल्द्वानी से लाते हैं। महिलाओं को काम देने में सामाजिक बाधाएं आती हैं।

स्वास्थ्य के मामले में सुनील एक मिसाल हैं। 40 वर्ष की उम्र में वे मैराथन दौड़ते हैं और अपोलो, वेदांता जैसे इवेंट्स में मेडल जीत चुके हैं। उनकी डाइट नियंत्रित है – सुबह हाई न्यूट्रिशन फूड, शाम में 1-2 रोटी। यह फिटनेस उन्हें कठिन श्रम करने की ऊर्जा देती है।

गांव को आत्मनिर्भर बनाने की मुहिम

सुनील न केवल अपनी सफलता पर ध्यान दे रहे हैं, बल्कि गांव के विकास में भी योगदान दे रहे हैं। उन्होंने गांव में 1420 पेड़ लगवाए, जो पर्यावरण संरक्षण में मदद कर रहे हैं। फ्री बीज बांटते हैं और युवाओं को ट्रेनिंग देते हैं।

सुनील ने तीन लोगों को स्वरोजगार से जोड़ा है, और उनका लक्ष्य है कि गांव के युवा पलायन न करें। वे मानते हैं कि पहाड़ से प्यार करो, जल-जीवन-जंगल को समझो। खेती की लत लगाओ। बाहर कमाओ, लेकिन गांव में निवेश करो। बंजर जमीन को उपजाऊ बनाओ। सरकार सब्सिडी और ट्रेनिंग देती है, जैसे पंतनगर, हिसार आदि संस्थानों से।

युवाओं के लिए दिशा

सुनील सिंह बिष्ट की कहानी बताती है कि जुनून और मेहनत से पहाड़ों में भी लाखों की कमाई संभव है। मोती की खेती जैसे प्रयोग उत्तराखंड के युवाओं को नई दिशा दे सकते हैं। यदि आप भी ऐसा कुछ करना चाहते हैं, तो सुनील जैसे लोगों से जुड़ें और गांव को आत्मनिर्भर बनाएं।

सुनील सिंह बिष्ट का फोन नंबर (8021721864) है, जहां से लोग मोती की खेती की जानकारी ले सकते हैं। वे कहते हैं, “ट्रेनिंग लो, गवर्नमेंट सब्सिडी लो, मैं फ्री गाइड करूंगा।”

RELATED ARTICLES
error: Content is protected !!